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_HDFC बैंक 'परिवर्तन' और 'सुविधा' संस्था के साझा प्रयास से बदली समराज सहित कई गांवों की तस्वीर , शुद्ध पेयजल, आधुनिक खेती और हथकरघा से आत्मनिर्भर बन रहीं ग्रामीण महिलाएंThrough the collaborative efforts of HDFC Bank's 'Parivartan' initiative and the 'Suvidha' organization, the landscape of several villages—including Samraj—has been transformed; rural women are achieving self-reliance through access to clean drinking water, modern farming techniques, and handloom weaving.

 दबंग देश आदर्श मेवाड़े

​मण्डलेश्वर ( निप्र )। मध्यप्रदेश के खरगोन जिले के महेश्वर ब्लॉक में विकास की एक ऐसी लहर चल रही है, जिसने न केवल ग्रामीणों की प्यास बुझाई है, बल्कि उनके जीवन जीने के ढंग को ही बदल दिया है। कभी पथरीली राहों पर सिर पर पीतल के घड़े रखकर मीलों चलने वाली महिलाओं के हाथों में अब हथकरघे की कमान है और खेतों में ड्रिप सिंचाई की तकनीक। यह मुमकिन हुआ है एचडीएफसी बैंक 'परिवर्तन' और 'सुविधा' (SUVIDHA) संस्था के 'समग्र ग्रामीण विकास कार्यक्रम' (HRDP 2.0) के साझा प्रयासों से, जिसने समराज सहित आसपास के कई गांवों में जल संकट और स्वास्थ्य की पुरानी चुनौतियों को जड़ से उखाड़ फेंका है।


​इस बदलाव की सबसे सशक्त तस्वीर समराज गांव की सीमा के रूप में उभरती है। दो बच्चों की मां और कुशल हथकरघा बुनकर सीमा के लिए पानी कभी महज एक जरूरत नहीं, बल्कि रोज सुबह की पहली और रात की आखिरी चिंता हुआ करती थी। गांव का पानी देखने में तो साफ था, लेकिन उसमें टीडीएस (TDS) की मात्रा 1350 mg/L तक थी, जो सेहत के लिए बेहद खतरनाक स्तर है। इसके कारण बच्चे अक्सर पेट दर्द और संक्रमण की चपेट में रहते थे और परिवार की गाढ़ी कमाई अस्पतालों के चक्कर लगाने में खर्च हो जाती थी। सीमा भावुक होकर कहती हैं, "थकान तो बर्दाश्त हो जाती थी, लेकिन यह डर हमेशा बना रहता था कि कहीं हम अपने बच्चों को जहर तो नहीं पिला रहे ?"

​आज वही समराज गांव सौर ऊर्जा से संचालित 'जल मीनार' के साथ आत्मनिर्भरता की मिसाल बन चुका है। अब गांव की महिलाओं को पानी के लिए 2-3 घंटे की जद्दोजहद नहीं करनी पड़ती, बल्कि घर के पास ही शुद्ध पेयजल उपलब्ध है। समय की इस बचत ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई गति दी है; महिलाएं अब अपने बचे हुए समय का उपयोग खेती, सिलाई-कढ़ाई और प्रसिद्ध महेश्वरी साड़ियों की बुनाई में लगा रही हैं। संस्था ने यहां एक हैंडलूम सेंटर भी स्थापित किया है, जिससे पारंपरिक कला को नया जीवन मिला है।

​सिर्फ पेयजल ही नहीं, इस 'परिवर्तन' ने महेश्वर की खेती को भी आधुनिक बनाया है। क्षेत्र में 6 बांधों को मजबूती दी गई है और 7 कुओं का जीर्णोद्धार किया गया है, जिससे सिंचाई की क्षमता बढ़ी है। 105 से अधिक ड्रिप सिंचाई प्रणालियों के माध्यम से किसान अब बूंद-बूंद पानी का महत्व समझ रहे हैं और फूलों की खेती (फ्लोरीकल्चर) जैसे नए प्रयोग कर अपनी आय बढ़ा रहे हैं। बच्चों के भविष्य को सुरक्षित करने के लिए स्कूलों में 5 आरओ (RO) यूनिट्स और स्मार्ट क्लासरूम की सुविधा दी गई है, ताकि बेहतर स्वास्थ्य के साथ वे आधुनिक शिक्षा से जुड़ सकें।

​करीब 800 व्यक्तियों और 200 परिवारों को सीधे लाभ पहुँचाने वाला यह कार्यक्रम केवल बुनियादी ढांचे तक सीमित नहीं है, बल्कि यह ग्रामीणों में स्वामित्व की भावना जगा रहा है। जल मीनारों का प्रबंधन अब ग्राम समितियां खुद कर रही हैं, जिसमें महिलाओं की भागीदारी सबसे प्रमुख है। 'सुविधा' संस्था के माध्यम से लागू यह मॉडल साबित करता है कि जब कॉर्पोरेट जिम्मेदारी और सामुदायिक भागीदारी साथ मिलती है, तो महेश्वर के खेतों और घरों में उम्मीद की नई फसल लहलहाने लगती है। सीमा के शब्दों में कहें तो, "पानी पहले हमारे संघर्ष का हिस्सा था, अब यह हमारी प्रगति का साथी है।"

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