जे एन एस स्नातकोत्तर महाविद्यालय शुजालपुर में कला संकाय विभाग के संयुक्त तत्वावधान में "भारतीय ज्ञान परंपरा और बौद्धिक पुनर्जागरण पर्यावरण सामाजिक और आर्थिक नीतियों का पुनरावलोकन"विषय पर हुआ एक दिवसीय अंतराष्ट्रीय सेमिनार का आयोजन
दिनांक 17 दिसंबर 2026 को जवाहरलाल नेहरू स्मृति शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, शुजालपुर में आंतरिक गुणवत्ता आश्वासन प्रकोष्ठ (IQAC) एवं पी.एम. उषा योजना के संयुक्त तत्वावधान में एवं प्रायोजक उच्च शिक्षा विभाग मध्य प्रदेश शासन भोपाल आयोजक जवाहरलाल नेहरू स्मृति शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय शुजालपुर, समन्वयक उद्यमिता विकास केंद्र मध्य प्रदेश सेडमेप भोपाल के अंतर्गत" भारतीय ज्ञान परंपरा और बौद्धिक पुनर्जागरण पर्यावरण सामाजिक और आर्थिक नीतियों का पुनरावलोकन "विषय पर एक दिवसीय अंतराष्ट्रीय सेमिनार का आयोजन किया गया।
कार्यक्रम का शुभारंभ मां सरस्वती की प्रतिमा पर पुष्प अर्पित एवं सरस्वती वंदना के साथ हुआ। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में श्री इंदर सिंह परमार उच्च शिक्षा तकनीकी एवं आयुष मंत्रालय मध्यप्रदेश शासन भोपाल,श्री आलोक खन्ना अध्यक्ष महाविद्यालय जनभागीदारी समिति शुजालपुर,विषय विशेषज्ञ डॉ. मुकेश मिश्रा डायरेक्टर दत्तोपंत ठेगडी शोध संस्थान भोपाल, डॉ एस के मिश्रा उज्जैन, अनु बाफना (दुबई) , डॉ.दीप्ति श्रीवास्तव प्राचार्य सरोजिनी नायडू स्वशासी स्नातकोत्तर महाविद्यालय भोपाल,विषय विशेषज्ञ डॉ. सत्येंद्र कुमार मिश्र सम्राट विक्रमादित्य विश्वविद्यालय अर्थशास्त्र विभाग सहभागिता कर अपने विचार व्यक्त किए, आई क्यू ऐसी कोऑर्डिनेटर डॉ. बी.के. त्यागी, उपस्थित रहे। कार्यक्रम कि अध्यक्षता महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ.राजेश कुमार शर्मा द्वारा की गई।
अतिथियों का स्वागत भाषण महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ. राजेश कुमार शर्मा द्वारा प्रस्तुत किया गया।
कार्यक्रम की जानकारी एवं रूपरेखा महाविद्यालय के आई क्यू ऐसी कोऑर्डिनेटर डॉ. बी. के. त्यागी द्वारा प्रस्तुत की गई।
मुख्य अतिथि श्री इंदर सिंह परमार ने भारतीय ज्ञान परंपरा और बौद्धिक पुनर्जगरण पर्यावरण, सामाजिक और आर्थिक नीतियों का पुनरावलोकन विषय पर कहा कि शुभ-लाभ और भारतीय दर्शन: भारतीय दृष्टिकोण पर आधारित
भारत की सभ्यता केवल भौतिक समृद्धि की नहीं, बल्कि “शुभ-लाभ” जैसे मूल्यों की वाहक रही है, जहाँ शुभ का अर्थ है कल्याण और लाभ का अर्थ है सामूहिक उन्नति। भारतीय दर्शन का यही दृष्टिकोण आज भी हमारे पाठ्यक्रम, संस्कृति और सामाजिक चेतना में दिखाई देता है।
कोरोना काल में जब दुनिया बाजार और मुनाफे की चिंता में थी, तब भारत ने मानवता को प्राथमिकता देते हुए वैक्सीन का निर्माण किया। भारत ने न केवल अपने नागरिकों का जीवन बचाया, बल्कि “वसुधैव कुटुम्बकम्” की भावना के साथ अनेक देशों को वैक्सीन देकर पूरी दुनिया को परिवार मानने की परंपरा को साकार किया।
भारतीय सभ्यता की मिट्टी में सहयोग और कर्तव्य का भाव रचा-बसा है। यहाँ देश और समाज का कर्ज चुकाना प्रत्येक नागरिक का नैतिक दायित्व माना गया है। यही कारण है कि भारतीय दर्शन में नैतिक मूल्यों, कर्तव्यबोध और सेवा को जीवन का आधार माना गया।
ऋषि-मुनियों की ज्ञान परंपरा ने समाज को वैज्ञानिक सोच से भी जोड़ा। पीपल जैसे वृक्षों को पूजनीय मानने के पीछे धार्मिक ही नहीं, बल्कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण भी रहा ये वृक्ष प्राणवायु प्रदान करते हैं और पर्यावरण की रक्षा करते हैं। इसी तरह वनस्पति संरक्षण, नदियों के प्रति कृतज्ञता, गंगा-यमुना जैसी नदियों को माँ का दर्जा देना प्रकृति के प्रति सम्मान का प्रतीक है।
भारतीय दर्शन में सूर्य को ऊर्जा का मुख्य स्रोत माना गया। सूर्य से ही पृथ्वी पर ऊर्जा, जीवन और अनेक खनिज तत्वों की उत्पत्ति मानी गई। आज़ादी के अमृत काल में भारत नवीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में अग्रणी देशों में शामिल हो गया है, जो प्राचीन दर्शन और आधुनिक विज्ञान का सुंदर समन्वय है।
देशी गाय को भारतीय संस्कृति में विशेष स्थान दिया गया है। इसे केवल आस्था से नहीं, बल्कि स्वास्थ्य, कृषि और पर्यावरण के दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण माना गया। भारतीय दृष्टिकोण हमेशा देश की आवश्यकताओं और परिस्थितियों से जुड़ा रहा, न कि केवल विदेशी सोच की नकल पर आधारित।
भारतीय शौर्य, विज्ञान और शिक्षा की परंपरा भी गौरवशाली रही है। प्राचीन काल में भारत में शल्य-चिकित्सा, गणित, खगोल और वास्तु का उच्च स्तर था। गुरुकुल शिक्षा प्रणाली ने चरित्र निर्माण को शिक्षा का आधार बनाया। यहाँ तक कि विदेशों में भी भारतीय इंजीनियरों और विद्वानों ने नगर-योजना और ज्ञान-विज्ञान में योगदान दिया।
हमारे पूर्वज हर क्षेत्र में आगे थे—ज्ञान, विज्ञान, युद्धकला, चिकित्सा और दर्शन में। आज आवश्यकता है कि हम भारत की शिक्षा और दर्शन पर गंभीरता से विचार करें और उसी आधार पर भारत को श्रेष्ठतम बनाने का संकल्प लें।
विषय प्रवर्तक एवं विशेषज्ञ प्रो. डॉ.मुकेश मिश्रा ने कहा कि विश्वास, पर्यावरण और ज्ञान भारतीय ज्ञान परंपरा की विशेषता है।
भारत की अर्थनीति केवल आंकड़ों और लाभ-हानि पर नहीं, बल्कि विश्वास और नैतिकता पर आधारित रही है। यह व्यवस्था विदेशों में भिन्न है।
भारतीय सभ्यता और ज्ञान परम्परा में पर्यावरण का अस्तित्व सदैव से रहा है। यहाँ पेड़-पौधों, पर्वतों और नदियों को केवल प्राकृतिक संसाधन नहीं, बल्कि पूजनीय माना गया है। उनकी पूजा और संरक्षण भारतीय जीवन-शैली का हिस्सा रहा है, जिससे प्रकृति और मानव के बीच संतुलन बना रहा।
प्रसिद्ध विद्वान विद्यानिवास मिश्र के विचारों को कोड करते हुए कहा कि,“भारतीयता को अगर देखना हो तो निरंतरता में देखिए।” अर्थात भारत की पहचान उसकी सतत ज्ञान परंपरा, मूल्य और संस्कारों में निहित है।
विषय विशेषज्ञ डॉ. सत्येंद्र कुमार मिश्र सम्राट विक्रमादित्य विश्वविद्यालय अर्थशास्त्र विभाग ने भारतीय ज्ञान परंपरा और राष्ट्रीय शिक्षा नीति एवं विकसित भारत, भारतीय ज्ञान परंपरा परिणाम एवं प्रक्रिया पर अपने व्याख्यान दिए।
वही विषय विशेषज्ञ डॉ. दीप्ती ने कहा कि हमारे वेद, उपनिषद और प्राचीन ग्रंथों में व्यक्तित्व विकास के मूल तत्व निहित हैं। उन्होंने बताया कि भारतीय समाज और दर्शन समरसता, सहयोग और संतुलन का संदेश देता है।
डॉ. दीप्ती ने गुरु-शिष्य परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि महाभारत जैसे ग्रंथ जीवन के हर पक्ष को “कोड” करते हैं, जो व्यक्ति को धर्म, कर्म और कर्तव्य का बोध कराते हैं। उन्होंने हवन-कुंड की उपयोगिता बताते हुए कहा कि यह केवल धार्मिक क्रिया नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि और मानसिक एकाग्रता का माध्यम है।
उन्होंने व्यक्तित्व निर्माण के उपायों पर प्रकाश डालते हुए सत्यता, निःशुल्क सेवा, स्वाध्याय, आत्म-निरीक्षण और व्यवहार में भारतीय ज्ञान को उतारने पर जोर दिया। साथ ही प्राध्यापकों की अध्यापन पद्धति को प्रेरणादायी, संवादात्मक और मूल्य-आधारित बनाने की आवश्यकता बताई।
अंत में डॉ. दीप्ती ने , स्वामी विवेकानंद जी के विचार को कोड करते हुए कहा कि “संसार एक व्यायामशाला है, जहाँ मनुष्य निरंतर अभ्यास से अपने व्यक्तित्व को निखारता है।” आत्म-अवलोकन कर जीवन में भारतीय ज्ञान परंपरा को अपनाने का आह्वान किया गया।।
तकनीकी सत्र प्रथम का संचालन डॉ.बी. एल. चोरडिया ने किया। सत्र कि अध्यक्षता डॉ बी.एस. विभूति शासकीय गोलाना महाविद्यालय ने की द्वितीय तकनीकी सत्र का संचालन प्रो.डॉ. राजरानी खुराना ने किया। तथा समापन सत्र का आभार प्रो. कु. आरती मेवाड़ा ने माना। सेमीनार में विभिन्न प्राध्यापकों एवं शोधार्थियों ने अपने शोध पत्रों का वाचन भी किया इस इस अवसर पर गोलाना महाविद्यालय के प्राचार्य बिद्याशंकर विभूति, शाजापुर बीकेएसएन कॉलेज के प्राचार्य डॉ.वी.पी. मीणा, पोलाई कला प्राचार्य श्री दिनेश धनगर और जिनेश महाविद्यालय के पूर्व सेवानिवृत्त प्राचार्य डॉ विनोद देशमुख और महाविद्यालय के समस्त स्टाफ एवं बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएँ उपस्थित रहे। कार्यक्रम के बीच में पुस्तक विमोचन हुआ तथा मंत्री जी को पुस्तक भी भेंट की। सम्पूर्ण कार्यक्रम का संचालन डॉ. आनंद कुमार अजनोदिया द्वारा किया गया तथा संपूर्ण कार्यक्रम का आभार प्रो. आशीष यादव द्वारा किया गया। संपूर्ण कार्यक्रम का प्रतिवेदन प्रो. मोना जाटव द्वारा प्रस्तुत किया गया।


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