(अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर विशेष)
जयेश पटेल दबंग देश
खेतिया,,,
अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर देशभर में महिलाओं के संघर्ष, साहस और उपलब्धियों को सम्मान दिया जाता है। यह दिन इस बात की याद दिलाता है कि जब बेटियों को अवसर मिलता है, तो वे न केवल अपने परिवार बल्कि पूरे समाज और देश का नाम रोशन करती हैं। ऐसी ही प्रेरणादायक मिसाल हैं -मल्फा की माया पाटिल
खेतिया के पास के एक छोटे से गांव मल्फा में रहने वाली, 34 वर्षीय महिला सुश्री माया पाटिल जो दोनों हाथ और पैर से से विकलांग है. जो अपनी विकलांगता को कमजोरी न मानकर उसे अपनी ताकत बना ली है और आज वह आम लोगों की तरह जिंदगी जी रही है. साथ ही अन्य लोगों के लिए यह एक मिसाल साबित हो रही है.
अगर दिल में हौसला और जुनून हो तो कोई भी व्यक्ति किसी भी काम को आसानी से कर सकता है. उसके काम में संसाधनों का अभाव बाधा नहीं बनते. एक ऐसी ही कहानी है बड़वानीजिले के खेतिया के निकट मल्फा ग्राम से जुड़ी हुई, जो यह साबित करती है कि महिलाएं भी सब कुछ कर सकती हैं. हम बात कर रहे हैं माया पाटिल के बारे में, जो खुद हाथ पैर से विकलांग हैं, इसके बावजूद उन्होंने अब तक अनेको बच्चों की जिंदगी संवारने का प्रयास किया है और वह प्रतिदिन टयूशन कर बच्चों को शिक्षित कर रही
पिता हीरालाल सोमा पाटिल,व माता उषा बाई के,परिवार में चार बहनों एक भाई में दूसरे क्रम पर माया है जो विकलांग होकर आज अपने परिवार के लिए सबसे बड़ा सहारा बनी हुई है। विकलांगता को अपनी कमजोरी ना मानते हुए प्राप्त ज्ञान का अन्य बच्चों में हस्तांतरण करने की प्रक्रिया में सफलतापूर्वक शामिल हो गई, वह स्वयं अन्य परीक्षाओं की तैयारी कर रही वहीं अन्य बच्चों को शिक्षित करने का जुनून इतना है कि वह पंचायत से अपने कामों को निपटने के बाद दोपहर से शाम तक ग्रामीण क्षेत्र के बच्चों की विभिन्न कक्षाओं के ट्यूशन करती है।
माया पाटिल ग्राम पंचायत मल्फा में मोबिलाइजर के पद पर कार्यरत है पंचायत में बैठते समय वह पंचायत में आने वाली ग्रामीण महिलाओं को महिलाओं की सुरक्षा, महिलाओं की सुरक्षा के लिए बने कानून की जानकारी देती है,परिवार के भरण पोषण के लिए उसने अपनी कभी विकलांगता का बहाना नही बनाया संघर्षों से भरे जीवन में अपने राह स्वयं चुनी और परिवार का सहारा बनी खेतिया से लगे ग्रामीण क्षेत्र के ग्राम मल्फा की माया अन्य महिलाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी हुई है, ग्रामीण क्षेत्र की महिलाएं जब अपने समस्याओं को लेकर पंचायत आती है तो वह उनकी समस्या हरदम सुलझाने में सक्रिय रहती है,आवश्यकता पड़ने पर वरिष्ठ अधिकारियों से मार्गदर्शन लेने में भी नहीं चूकती है। छोटे से ग्राम की महिला कि यह कहानी है जो शारीरिक रूप से जरूर विकलांग है किंतु मन मे दृढ़ इच्छा शक्ति के दम पर सबसे अधिक बलवान होकर बच्चों के बीच शिक्षा का प्रसार करते हुए अब तक कई बच्चों को उन्होंने शिक्षित किया स्वयं MA,, B ed होकर उच्च स्तरीय परीक्षाओं की तैयारी कर रही है किंतु इन सब के बीच परिवार का सहारा बनकर निरंतर अपने भूमिका का निर्वहन भी कर रही ।
माया कहती है कि कभी भी विकलांगता उनके आड़े नही आई वजह थी सच्चे मन से आगे बढ़ना,जब मेरे जैसी महिला यह सब कर सकती तो सभी महिलाएं आगे बढ़ सकती है
विकलांग होने से वह आसानी से चल नही पाती जिसके चलते परिजन प्रतिदिन पंचायत लाना व लेजाना करते हेआज हमारे संवाददाता,,, राजेश नाहर से बात करते अत्यंत प्रसन्न थी,,
बड़े शहरों की उपलब्धियां उस अनुरूप रहती है जहां सुविधा बहुत सारी हो सकती किंतु एक छोटा सा ग्रामीण क्षेत्र जिसमें एक विकलांग महिला का ग्राम की महिलाओं के अधिकारों और समस्याओं के लिए निरंतर कार्य करना बच्चों की शिक्षा के लिए निरंतर प्रेरणा बना है, दृढ़ विश्वास की एक सच्ची कहानी अपने संघर्ष में कभी भी विकलांगता को सीढी नहीं बनाया दृढ़ विश्वास के साथ सदैव आगे बढ़ने का प्रयास किया
कहानी नारी सशक्तिकरण का सशक्त उदाहरण है। सशक्तिकरण केवल अधिकार पाने तक सीमित नहीं, बल्कि आत्मविश्वास, शिक्षा और स्वतंत्र निर्णय लेने की क्षमता भी है।विकलांग होने के बाद भी अपनी कर्म शक्ति के बल पर न केवल नीति क्रियान्वयन का हिस्सा बनीं, बल्कि समाज में सकारात्मक बदलाव की वाहक भी बनीं। उनकी सफलता यह साबित करती है कि बेटियां किसी से कम नहीं—उन्हें केवल अवसर और प्रोत्साहन की आवश्यकता है।
अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर माया पाटिल के जज्बे को सलाम,,,,,,


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